मूर्ति नहीं, मां ने दिया था तलवार पूजा का निर्देश* *यहां मिलती है प्रेत-बाधाओं से मुक्ति

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*मां की कृपा से खत्म हो गयी थी तावन की बीमारी
चन्द्रभान तिवारी

बड़हलगंज: गोरखपुर जनपद के दक्षिणांचल में पवित्र सरयू तट पर बसी नगर पंचायत बड़हलगंज के एक किलोमीटर उत्तर संसारपार गांव में देवी दुर्गा के अलौकिक मन्दिर में आने वाले सभी भक्तों की मुरादें दुर्गा मां पूरी करती हैं। सच्चे मन व पूर्ण श्रद्धा के साथ मानी गयी सभी मनौतियां यहां पूरी होती हैं। वर्ष भर यहां श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। नवरात्रों में यहां भक्तों की भारी भीड़ उपस्थित होती है।

संसारपार दुर्गा मन्दिर का इतिहास काफी पुराना है। जनश्रुतियों के अनुसार संसारपार के रघुवंशी ठाकुरों के पूर्वज सीतापुर जनपद के नैमिषारण्य से यहां आए थे। उन्हीं के साथ एक कन्या के रूप में दुर्गा मां यहां आयी थीं। रघुवंशी ठाकुर कुलदेवी के रूम में इनकी उपासना करते थे। कुछ पीढ़ियों के बाद इनकी पूजा बंद हो गयी तब दुर्गा मां ने बुद्धिसेन सिंह को स्वप्न में दर्शन देकर उन्हें अपनी पूजा करने का निर्देश दिए।

स्वप्न में मिले निर्देश को मान कर बुद्धिसेन सिंह ने एक खपरैल के मकान में मां की चौरी बनाकर पूजा प्रारम्भ की। पूजा के बाद रघुबंशियों का ऐश्वर्य बढ़ने लगा। बुद्धिसेन सिंह पर मां की भरपूर कृपा थी। कहते हैं कि बुद्धिसेन सिंह स्नान के बाद अपनी भीगी धोती आसमान में उछाल देते थे और वह तुरन्त सूख कर नीचे आ जाती थी। धीरे-धीरे मन्दिर की ख्याति बढ्ने लगी और लोग यहां आने लगे। मां की कृपा से सबके कार्य बनने लगे। आगे चलकर गांव के ही बद्री सिंह व संसारपार गांव के तत्कालीन प्रधान स्वामी मिश्र देवरिया जनपद के पैकौली गांव से एक विद्वान ब्राह्मण पं त्रिवेणी दत्त मिश्र को मां की अर्चना-पूजा हेतु यहां ले आये। खपरैल के स्थान पर एक सुन्दर मन्दिर का निर्माण हुआ। पं त्रिवेणी दत्त मिश्र यहां मां की आराधना करने लगे। एक बार गांव में भयंकर तावन नामक बीमारी फैली। कई लोग काल के गाल में चले गए। ग्रामीण मां की आराधना करने लगे। स्वप में मां ने बद्री सिंह को चौबीस घण्टे निराजल रह आराधना का आदेश दिया। लोगों ने वैसा
ही किया। गांव से तावन खत्म हो गयी। फिर से इस गांव में तावन नहीं आयी। पं त्रिवेणी दत्त मिश्र की पूजा से प्रसन्न हो मां ने उनपर भरपूर कृपा की और यहां प्रेत-बाधाओं से मुक्ति मिलने लगी। नवरात्रों में गांव के पश्चिम स्थित पीपल के वृक्ष से लेकर मन्दिर तक प्रेत-बाधा से पीड़ित लोगों की भारी भीड़ होती थी। पीड़ित चीखते-चिल्लाते मन्दिर तक पहुंचते थे और वहां उन्हें मुक्ति मिल जाती थी। यहां मां ने अपनी मूर्ति लगाने से मना किया और रघुबंशियों की खानदानी तलवार को ही पूजने का आदेश दिया। पं त्रिवेणी दत्त मिश्र के बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र पं रमापति मिश्र यहां के पुजारी बने।

रघुवंशी क्षत्रिय नागेन्द्र सिंह रघुवंशी बताते हैं कि यह तलवार ही मां का प्रतीक है। नवरात्रि में यहां भक्तों की भारी भीड़ होती है। मनौतियां पूरी होने पर लोग चढ़ावा भी चढ़ाते हैं पर रघुवंशी मन्दिर में चढ़े प्रसाद को ग्रहण नहीं करते हैं। किसी भी शुभकार्य के पूर्व यहां के क्षत्रिय मां की पूजा करते हैं और आशिर्वाद लेते हैं। संसारपार के पूर्व प्रधान योगेंद्र सिंह के नेतृत्व में करीब एक दशक पूर्व मंदिर कमेटी का गठन हुआ और प्रवीण सिंह, सैनिक महेन्द्र सिंह, नागेंद्र सिंह, रणविजय सिंह सार्थक शाही आदि सहित ग्रामीणों के सहयोग से वर्तमान में यहां एक भव्य मंदिर का निर्माण हो चुका है। वर्तमान में पं त्रिवेणी दत्त मिश्र के पौत्र पं प्रद्युम्न मिश्र मन्दिर के पुजारी हैं। पुजारी को छोड़ मन्दिर के गर्भ गृह में अन्य लोगों का प्रवेश वर्जित है।

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