लखनऊ।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2012 से 2026 तक का दौर केवल सत्ता परिवर्तन का इतिहास नहीं है, बल्कि यह कानून-व्यवस्था की बदलती राजनीतिक प्राथमिकताओं का भी आईना है। 15 मार्च 2012 से 19 मार्च 2017 तक अखिलेश यादव की सरकार रही और 19 मार्च 2017 से योगी आदित्यनाथ लगातार मुख्यमंत्री हैं।
इन दोनों शासनकालों को यदि कानून-व्यवस्था के नजरिए से देखा जाए तो सबसे बड़ा अंतर ‘अपराध के बाद कार्रवाई’ और ‘अपराध के पहले ही भय पैदा करने’ की रणनीति के रूप में सामने आता है।
अखिलेश यादव सरकार के पांच वर्ष में कानून-व्यवस्था विपक्ष के राजनीतिक हमलों का बड़ा मुद्दा बनी रही। वहीं योगी सरकार ने सत्ता संभालते ही कानून-व्यवस्था को अपनी सरकार की सबसे प्रमुख राजनीतिक पहचान बना दिया। 2017 में सत्ता परिवर्तन के बाद सरकार ने अपराधियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई, गैंगस्टर एक्ट, एनएसए, संपत्ति जब्ती और माफिया नेटवर्क पर आर्थिक प्रहार को पुलिसिंग की केंद्रीय रणनीति बनाया।
अखिलेश काल: विकास के साथ कानून-व्यवस्था सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती
2012 से 2017 का अखिलेश यादव शासनकाल उत्तर प्रदेश में एक्सप्रेसवे, मेट्रो, आईटी और बुनियादी ढांचे के विकास के लिए याद किया जाता है, लेकिन कानून-व्यवस्था उस सरकार की सबसे बड़ी राजनीतिक कमजोरी बन गई।
इस दौर में अपराध की घटनाएं विपक्ष के लिए लगातार बड़ा राजनीतिक हथियार बनीं। हालांकि तस्वीर का दूसरा पक्ष यह भी है कि अपराध के आंकड़ों को केवल राजनीतिक आरोपों से नहीं, बल्कि दर्ज मुकदमों, अपराध की प्रकृति, पुलिस कार्रवाई और राष्ट्रीय स्तर के अपराध आंकड़ों के साथ देखना जरूरी है। यूपी पुलिस के अपने रिकॉर्ड में 2012 और 2015 जैसे वर्षों के विस्तृत अपराध आंकड़े उपलब्ध हैं, जिनसे उस समय अपराध की व्यापकता और क्षेत्रीय अंतर का अध्ययन किया जा सकता है।
यानी अखिलेश सरकार का मॉडल मूलतः विकास-केंद्रित शासन के साथ पारंपरिक पुलिस व्यवस्था पर आधारित दिखाई देता है। उस समय पुलिसिंग में आज जैसी कमिश्नरेट व्यवस्था, व्यापक साइबर पुलिसिंग और अपराधियों की संपत्ति पर इतने बड़े पैमाने पर आर्थिक प्रहार की रणनीति दिखाई नहीं देती थी।
2017 के बाद बदला पुलिसिंग का पूरा ढांचा
योगी आदित्यनाथ सरकार के आने के बाद कानून-व्यवस्था को केवल पुलिस विभाग का विषय न रखकर सरकार की राजनीतिक कार्यशैली का केंद्रीय एजेंडा बनाया गया।
सात बड़े महानगरों में पुलिस कमिश्नरेट व्यवस्था लागू करना इसी बदलाव का महत्वपूर्ण उदाहरण है। इसका उद्देश्य पुलिस को अधिक प्रशासनिक एवं परिचालनिक अधिकार देकर शहरी अपराध, कानून-व्यवस्था और जनशिकायतों पर तेजी से कार्रवाई करना था।
इसके साथ ही पुलिस तंत्र का विस्तार हुआ—नए थाने, पुलिस चौकियां, साइबर क्राइम थाने, नारकोटिक्स थाने, महिला पुलिस चौकी एवं परामर्श केंद्र और एंटी-ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट को मजबूत किया गया।
‘एनकाउंटर मॉडल’ से ‘आर्थिक प्रहार’ तक
योगी सरकार की कानून-व्यवस्था नीति का सबसे चर्चित पक्ष अपराधियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई रही है।
सरकार द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के अनुसार, 2017 के बाद अब तक 267 दुर्दांत अपराधी मुठभेड़ों में मारे गए और 10,990 घायल हुए, जबकि 22,306 इनामी अपराधियों को जेल भेजा गया। गैंगस्टर एक्ट के तहत 85,118 अपराधियों और एनएसए के तहत 977 अपराधियों के विरुद्ध कार्रवाई का दावा किया गया है।
लेकिन योगी मॉडल की वास्तविक खासियत केवल मुठभेड़ नहीं, बल्कि अपराध की अर्थव्यवस्था पर प्रहार है।
मार्च 2017 से दिसंबर 2025 तक गैंगस्टर एक्ट के तहत ₹14,580 करोड़ से अधिक मूल्य की अवैध चल-अचल संपत्तियों के जब्तीकरण का दावा सरकार करती है।
चिन्हित 68 माफिया और उनके नेटवर्क के खिलाफ 1,459 लोगों पर 875 मुकदमे, 638 गिरफ्तारियां, 18 पर एनएसए और 785 पर गैंगस्टर एक्ट की कार्रवाई बताई गई है। इनके जरिए अर्जित ₹4,137 करोड़ से अधिक की संपत्ति जब्त करने का भी दावा है।
यानी पुलिसिंग का संदेश साफ था—
‘अपराध करो तो जेल जाओगे, और अपराध से कमाई संपत्ति भी नहीं बचा पाओगे।’
यही वह बिंदु है जहां 2012–17 और 2017–26 के कानून-व्यवस्था मॉडल में सबसे बड़ा अंतर दिखाई देता है।
अपराध के आंकड़े: दावा बनाम राजनीतिक विमर्श
योगी सरकार के अनुसार 2016 की तुलना में विभिन्न गंभीर अपराधों में बड़ी गिरावट दर्ज हुई है।
दावे के मुताबिक—
डकैती में 90 प्रतिशत कमी
लूट में 85 प्रतिशत कमी
हत्या में 47 प्रतिशत कमी
बलवा में 70 प्रतिशत कमी
फिरौती के लिए अपहरण में 62 प्रतिशत कमी
बलात्कार में 53 प्रतिशत कमी
दहेज हत्या में 19 प्रतिशत कमी
2017 में ही राज्य सरकार ने 2016 के मुकाबले हत्या, डकैती, बलात्कार और दंगों जैसी घटनाओं में गिरावट का दावा किया था।
हालांकि इन आंकड़ों को पढ़ते समय यह ध्यान रखना होगा कि अपराध पंजीकरण की प्रवृत्ति, पुलिस द्वारा एफआईआर दर्ज करने की नीति, जनसंख्या वृद्धि और NCRB की परिभाषाएं भी तुलना को प्रभावित करती हैं। इसलिए ‘अपराध कम हुआ’ और ‘अपराध की रिपोर्टिंग कम हुई’—इन दोनों को अलग-अलग देखना जरूरी है।
अखिलेश बनाम योगी: असली अंतर कहां है?
क्षेत्र
अखिलेश सरकार 2012–17
योगी सरकार 2017–26
कानून-व्यवस्था
परंपरागत पुलिसिंग
जीरो टॉलरेंस मॉडल
पुलिस प्रशासन
सामान्य जिला पुलिस व्यवस्था
कमिश्नरेट + विशेष इकाइयां
अपराधियों पर कार्रवाई
गिरफ्तारी एवं मुकदमे
गिरफ्तारी + गैंगस्टर + NSA + संपत्ति जब्ती
माफिया नीति
मुख्यतः पुलिस/न्यायिक कार्रवाई
नेटवर्क और आर्थिक साम्राज्य पर प्रहार
साइबर अपराध
सीमित संस्थागत ढांचा
अलग साइबर थानों एवं हेल्पलाइन का विस्तार
महिला सुरक्षा
हेल्पलाइन एवं पुलिस व्यवस्था
मिशन शक्ति, महिला डेस्क/चौकियां और विशेष अभियान
आपातकालीन पुलिस सेवा
100 व्यवस्था से 112 की ओर संक्रमण
यूपी-112 का विस्तार और रिस्पांस टाइम सुधार
मानव तस्करी
सामान्य पुलिस व्यवस्था
75 एंटी-ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट को थानों में बदला गया
पुलिस इंफ्रास्ट्रक्चर
पारंपरिक विस्तार
नए थाने, चौकियां और विशेष पुलिस इकाइयां
यूपी-112 ने बदली ‘पुलिस तक पहुंच’ की तस्वीर
योगी सरकार के दौरान पुलिसिंग का एक महत्वपूर्ण परिवर्तन तकनीक आधारित आपातकालीन सेवा है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार यूपी-112 ने 3 करोड़ 10 लाख से अधिक कॉल अटेंड किए। 28 मई 2021 से साइबर हेल्पलाइन डेस्क शुरू की गई और अब तक 7,52,422 सूचनाएं साइबर पोर्टल पर दर्ज किए जाने की बात कही गई है।
2016 की तुलना में 2025 में यूपी-112 के रिस्पांस टाइम को घटाकर 6 मिनट 41 सेकेंड किए जाने का दावा है।
अर्थात पुलिसिंग अब केवल थाने की चारदीवारी तक सीमित नहीं रही, बल्कि फोन, पोर्टल, सोशल मीडिया और साइबर सिस्टम तक पहुंच गई।
महिला सुरक्षा: हेल्पलाइन से मिशन शक्ति तक
महिला सुरक्षा के मोर्चे पर भी दोनों कालखंडों में अंतर दिखाई देता है।
अखिलेश सरकार के दौर में 1090 वीमेन पावर लाइन जैसी पहल महिला शिकायतों के लिए महत्वपूर्ण कदम थी। बाद के वर्षों में इसी व्यापक हेल्पलाइन संस्कृति के साथ 181 महिला हेल्पलाइन, 112, 1098 चाइल्ड हेल्पलाइन और मिशन शक्ति जैसे तंत्र जुड़े।
योगी सरकार ने इसे अलग-अलग योजनाओं के बजाय महिला सुरक्षा के एक समेकित अभियान के रूप में आगे बढ़ाया।
सोशल मीडिया पर आत्महत्या से संबंधित पोस्टों का संज्ञान लेकर जनवरी 2023 से दिसंबर 2025 के बीच 1,769 लोगों की जान बचाने का दावा इस नए डिजिटल पुलिसिंग मॉडल का एक अलग उदाहरण है।
न्यायालय में पैरवी: पुलिस कार्रवाई का अगला चरण
कानून-व्यवस्था केवल अपराधी को पकड़ने से खत्म नहीं होती। असली परीक्षा अदालत में होती है।
योगी सरकार का दावा है कि चिन्हित माफिया के मामलों में प्रभावी पैरवी के माध्यम से 35 माफिया और 94 सह-अपराधियों को आजीवन कारावास, जबकि दो को मृत्युदंड की सजा दिलाई गई।
यूपी पुलिस की आधिकारिक वेबसाइट भी अपराध आंकड़ों को NCRB के संकलित आंकड़ों से जोड़ती है और पुलिसिंग में ई-प्रॉसिक्यूशन जैसे तकनीकी तंत्र के इस्तेमाल पर जोर देती है।
क्या योगी मॉडल ने अपराध खत्म कर दिया?
नहीं।
यह दावा करना कि उत्तर प्रदेश में अपराध समाप्त हो गया है, आंकड़ों की कसौटी पर उचित नहीं होगा। उत्तर प्रदेश जैसा विशाल और 24 करोड़ से अधिक आबादी वाला राज्य अपराध से पूरी तरह मुक्त नहीं हो सकता।
लेकिन राजनीतिक और प्रशासनिक तुलना का सवाल यह है कि सरकार अपराध को लेकर क्या संदेश देती है और पुलिस को किस प्रकार के अधिकार एवं संसाधन देती है।
यहीं योगी सरकार का मॉडल अखिलेश सरकार से अलग दिखाई देता है।
अखिलेश सरकार की पहचान अधिकतर विकास और बुनियादी ढांचे की राजनीति से बनी, जबकि योगी सरकार ने विकास के साथ कानून-व्यवस्था और अपराधियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई को अपनी राजनीतिक ब्रांडिंग का हिस्सा बनाया।
2026 में सबसे बड़ा सवाल
नौ साल बाद योगी सरकार के सामने अब चुनौती केवल अपराध कम करने की नहीं है।
चुनौती यह है कि—
क्या ‘जीरो टॉलरेंस’ को संस्थागत, पारदर्शी और न्यायिक रूप से मजबूत पुलिसिंग में बदला जा सकता है?
क्या एनकाउंटर और बुलडोजर कार्रवाई की जगह भविष्य का यूपी फोरेंसिक, साइबर इंटेलिजेंस, डिजिटल पुलिसिंग, त्वरित अभियोजन और वैज्ञानिक जांच के मॉडल पर पूरी तरह आगे बढ़ेगा?
क्योंकि 2026 का अपराधी 2012 के अपराधी जैसा नहीं है। आज अपराधी के पास सोशल मीडिया, डिजिटल भुगतान, साइबर नेटवर्क और अंतरराज्यीय नेटवर्क हैं।
इसलिए यूपी की कानून-व्यवस्था की अगली परीक्षा ‘कितने अपराधी मारे गए’ नहीं, बल्कि ‘कितने अपराध वैज्ञानिक जांच और मजबूत अभियोजन के जरिए दोषी साबित हुए’ होगी।
पांच साल बनाम नौ साल की सबसे बड़ी राजनीतिक कहानी
2012 से 2017 तक उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था विपक्ष की सबसे बड़ी राजनीतिक आलोचना बनी।
2017 से 2026 तक कानून-व्यवस्था योगी सरकार की सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धियों में गिनी जाने लगी।
अखिलेश मॉडल में पुलिस व्यवस्था शासन का एक विभाग थी; योगी मॉडल में कानून-व्यवस्था शासन की राजनीतिक पहचान बन गई।
एक दौर में सवाल था—
‘सरकार अपराध पर नियंत्रण क्यों नहीं कर पा रही?’
दूसरे दौर में सरकार का दावा है—
‘अपराधी प्रदेश छोड़ दें या अपराध छोड़ दें।’
लेकिन लोकतंत्र में अंतिम फैसला न सरकार के दावे से होता है, न विपक्ष के आरोप से।
अंतिम कसौटी यही होगी—
आम नागरिक कितना सुरक्षित महसूस करता है, पीड़ित को कितनी जल्दी न्याय मिलता है, एफआईआर कितनी निष्पक्षता से दर्ज होती है, जांच कितनी वैज्ञानिक है और अदालत में अपराधी कितनी मजबूती से दोषी सिद्ध होता है।
यही उत्तर प्रदेश की 2012 से 2026 तक की कानून-व्यवस्था की असली तुलनात्मक कहानी है ! आभार वरिष्ठ पत्रकार भास्कर दुबे के फेसबुक वाल से
‘सियासत की पुलिसिंग’ से ‘पुलिसिंग की सियासत’ तक: अखिलेश के पांच साल बनाम योगी के नौ साल में बदली यूपी की कानून-व्यवस्था की तस्वीर
