लखनऊ उत्तरप्रदेश ! 45 फीसदी महिला भागीदारी की बहस के बीच 2027 में क्या उत्तर प्रदेश देखेगा महिला नेतृत्व की नई राजनीतिक पटकथा?
लखनऊ।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में कभी अठन्नी और रुपये के मुहावरों से रिश्तों की कीमत तय करने वाली सियासत अब नई राजनीतिक भाषा गढ़ रही है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश से उठी चारू चौधरी की राजनीतिक सक्रियता और समाजवादी पार्टी की सांसद डिंपल यादव की बढ़ती राजनीतिक भूमिका ने 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले एक नई बहस को जन्म दे दिया है—क्या अगला चुनाव केवल दलों के बीच मुकाबला होगा या उत्तर प्रदेश की राजनीति में पहली बार दो प्रभावशाली राजनीतिक परिवारों की ‘बहुरानियों’ के बीच भी प्रतीकात्मक मुकाबला दिखाई देगा?यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि चारू चौधरी कोई सामान्य राजनीतिक चेहरा नहीं हैं। वह राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष जयंत चौधरी की पत्नी और पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की राजनीतिक विरासत से जुड़े परिवार की बहू हैं। दूसरी ओर डिंपल यादव समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव की पत्नी, सांसद और यादव परिवार की राजनीतिक विरासत का प्रमुख महिला चेहरा हैं।हाल के दिनों में चारू चौधरी के सार्वजनिक राजनीतिक हस्तक्षेप ने इस चर्चा को और हवा दी है। सहारनपुर की स्वाभिमान रैली में अखिलेश यादव के ‘चवन्नी’ वाले बयान पर चारू का जवाब पश्चिमी यूपी की सियासत में खास तौर पर चर्चा में रहा।
सवाल सिर्फ डिंपल बनाम चारू का नहीं,पहली नजर में यह मुकाबला दो महिलाओं का दिखाई देता है, लेकिन इसकी राजनीतिक परतें कहीं अधिक गहरी हैं।
डिंपल के पीछे समाजवादी पार्टी का पीडीए समीकरण, यादव-मुस्लिम सामाजिक आधार और अखिलेश यादव का संगठन है।वहीं चारू के पीछे चौधरी चरण सिंह की विरासत, जाट राजनीति, राष्ट्रीय लोकदल का पश्चिमी उत्तर प्रदेश में प्रभाव और भाजपा-आरएलडी की मौजूदा राजनीतिक साझेदारी दिखाई देती है।यही कारण है कि यदि यह मुकाबला आकार लेता है तो इसे केवल व्यक्तिगत लोकप्रियता की लड़ाई मानना राजनीतिक भूल होगी।यह मुकाबला दो राजनीतिक मॉडलों का टकराव भी बन सकता है—एक तरफ लखनऊ से संचालित समाजवादी राजनीति का महिला चेहरा और दूसरी तरफ पश्चिमी उत्तर प्रदेश की चौधराहट से निकलता महिला नेतृत्व।
क्या डिंपल को मुख्यमंत्री का चेहरा बनाएंगे अखिलेश?
यही सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल है।फिलहाल डिंपल यादव को मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित करने की कोई आधिकारिक घोषणा सामने नहीं आई है। इसलिए इसे अभी राजनीतिक संभावना और रणनीतिक चर्चा के रूप में ही देखना चाहिए।
लेकिन अगर अखिलेश यादव चुनाव से पहले डिंपल यादव को मुख्यमंत्री पद के संभावित चेहरे के रूप में सामने रखते हैं, तो समाजवादी पार्टी एक साथ कई राजनीतिक संदेश देने की कोशिश कर सकती है।पहला—महिला नेतृत्व।
दूसरा—परिवार की राजनीतिक विरासत का अगला चरण।तीसरा—अखिलेश के नेतृत्व में सरकार और डिंपल के नेतृत्व में महिला मतदाताओं के बीच नया राजनीतिक संवाद।यह रणनीति खास तौर पर इसलिए महत्वपूर्ण होगी क्योंकि 2027 का चुनाव केवल जातीय समीकरणों से नहीं, बल्कि महिला मतदाताओं की निर्णायक भूमिका से भी प्रभावित हो सकता है।उत्तर प्रदेश में स्थानीय निकायों में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी पहले से महत्वपूर्ण है और राज्य निर्वाचन आयोग के आंकड़ों में स्थानीय निकायों में महिला प्रतिनिधित्व उल्लेखनीय स्तर पर दिखाई देता है।चारू चौधरी को भाजपा मुख्यमंत्री का चेहरा बनाएगी?यह सवाल फिलहाल उससे भी बड़ा राजनीतिक अनुमान है।भाजपा ने चारू चौधरी को मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाने की कोई घोषणा नहीं की है।
लेकिन राजनीति में कई बार चेहरा घोषित किए बिना भी किसी चेहरे को राजनीतिक रूप से स्थापित किया जाता है।चारू की सक्रियता को इसी नजरिए से देखने वाले लोग इसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में महिला नेतृत्व को मजबूत करने की कोशिश मान रहे हैं।
चारू यदि आने वाले महीनों में लगातार पश्चिमी यूपी से निकलकर पूरे प्रदेश में महिला सभाओं, किसान परिवारों, युवा महिलाओं और ग्रामीण मतदाताओं के बीच सक्रिय होती हैं, तो उनकी भूमिका केवल आरएलडी तक सीमित नहीं रहेगी।और यहीं से असली राजनीतिक सवाल पैदा होगा क्या भाजपा-आरएलडी गठबंधन चारू को पश्चिमी यूपी का चेहरा बनाएगा या उन्हें पूरे उत्तर प्रदेश की महिला राजनीति में उतारेगा?
पश्चिमी यूपी तक सीमित रहेगा मुकाबला?अगर चारू चौधरी केवल आरएलडी के पारंपरिक प्रभाव वाले क्षेत्रों—मेरठ, मुजफ्फरनगर, बागपत, शामली, बिजनौर, सहारनपुर और आसपास के इलाकों—तक सीमित रहती हैं, तो डिंपल बनाम चारू की लड़ाई मूलतः पश्चिम बनाम मध्य-पूर्वी यूपी की राजनीतिक कहानी बनकर रह जाएगी।लेकिन यदि भाजपा उन्हें प्रदेशव्यापी महिला अभियान का चेहरा बनाती है, तो समीकरण पूरी तरह बदल सकता है।तब मुकाबला होगा डिंपल की ‘सपा की बहू’ बनाम चारू की ‘चौधरी परिवार की बहू’ नहीं, बल्कि दो राजनीतिक परिवारों से निकलकर प्रदेश की महिलाओं तक पहुंचने वाले दो महिला चेहरों का।
यही वह बिंदु होगा जहां यह लड़ाई पश्चिमी यूपी की सीमाओं को पार कर सकती है।भाजपा के सामने सबसे बड़ा सवाल,भाजपा के पास पहले से महिला नेतृत्व के कई चेहरे हैं। उत्तर प्रदेश मंत्रिमंडल में भी महिला नेतृत्व मौजूद है।
इसलिए भाजपा के सामने प्रश्न केवल यह नहीं होगा कि चारू को कितना आगे बढ़ाया जाए।प्रश्न यह होगा कि—
क्या चारू को भाजपा की अपनी महिला राजनीति के समानांतर एक सहयोगी चेहरे के रूप में इस्तेमाल किया जाए, या उन्हें 2027 के लिए एक बड़े राजनीतिक प्रयोग का हिस्सा बनाया जाए?
यह फैसला पश्चिमी यूपी में जाट राजनीति, आरएलडी के प्रभाव और भाजपा के व्यापक सामाजिक समीकरण के बीच संतुलन से जुड़ा होगा।डिंपल की चुनौती भी आसान नहीं,डिंपल यादव के पास एक बड़ा राजनीतिक लाभ है—वह पहले से स्थापित राष्ट्रीय राजनीतिक चेहरा हैं।उनकी संसद में मौजूदगी, यादव परिवार की राजनीतिक विरासत और अखिलेश यादव के साथ उनका सार्वजनिक राजनीतिक जुड़ाव उन्हें चारू की तुलना में अधिक व्यापक पहचान देता है।लेकिन चारू की राजनीतिक ताकत अलग है।उनके पास चौधरी चरण सिंह की विरासत से जुड़ी भावनात्मक पूंजी है।इसलिए दोनों की राजनीतिक शैली भी अलग हो सकती है।डिंपल का विस्तार संसद से प्रदेश की व्यापक राजनीति तक है।चारू का संभावित विस्तार पश्चिमी यूपी के सामाजिक नेटवर्क से प्रदेशव्यापी महिला राजनीति तक हो सकता है।असली लड़ाई महिला वोट की होगी,2027 के चुनाव में महिला मतदाता निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं।ऐसे में राजनीतिक दलों के सामने सबसे बड़ा सवाल होगा कि महिला मतदाता को केवल ‘लाभार्थी’ के रूप में संबोधित किया जाए या सत्ता के संभावित नेतृत्वकर्ता के रूप में।यही कारण है कि महिला आरक्षण की बहस अब केवल संसद या विधानसभा की सीटों तक सीमित नहीं रह गई है।उत्तर प्रदेश में ग्रामीण निकायों में ओबीसी आरक्षण को लेकर नई प्रक्रिया भी चल रही है और इसके लिए राज्य सरकार ने समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग गठित किया है।ऐसे माहौल में महिला नेतृत्व की राजनीति आने वाले चुनाव में एक अलग राजनीतिक धुरी बन सकती है।बहुरानियों’ की राजनीति का नया अध्याय?उत्तर प्रदेश ने राजनीति में परिवारों का प्रभाव हमेशा देखा है।नेहरू-गांधी परिवार से लेकर यादव परिवार और चौधरी परिवार तक विरासत यहां केवल नाम नहीं, बल्कि चुनावी पूंजी रही है।लेकिन 2027 में पहली बार यह विरासत महिला चेहरों के माध्यम से नए तरीके से पेश किए जाने की संभावना पैदा कर रही है।डिंपल यादव यदि मुख्यमंत्री पद के चेहरे के रूप में सामने आती हैं और चारू चौधरी भाजपा-आरएलडी गठबंधन की प्रमुख महिला आवाज बनती हैं, तो चुनावी विमर्श में एक नया अध्याय खुल सकता है।तब सवाल यह नहीं होगा कि कौन किसकी पत्नी है।
सवाल होगा—कौन अपने परिवार की राजनीतिक विरासत को उत्तर प्रदेश की महिलाओं के राजनीतिक भविष्य से जोड़ पाता है? मुकाबला चेहरों का होगा या विचारधाराओं का?
अभी डिंपल को मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाए जाने या चारू चौधरी को भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित किए जाने की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है।
लेकिन राजनीति में कई बार चुनाव की पटकथा घोषणा से पहले लिखी जाती है।
चारू का पश्चिमी यूपी में सक्रिय होना और अखिलेश-जयंत के बीच बढ़ती राजनीतिक तल्खी इस संभावित मुकाबले की जमीन तैयार कर रही है।
यदि अखिलेश यादव डिंपल को आगे करते हैं और भाजपा-आरएलडी गठबंधन चारू को प्रदेशव्यापी महिला चेहरे के रूप में स्थापित करता है, तो 2027 का उत्तर प्रदेश चुनाव केवल योगी बनाम अखिलेश की पारंपरिक लड़ाई नहीं रहेगा।
उसके भीतर एक और दिलचस्प राजनीतिक कहानी चलेगी—डिंपल बनाम चारू।
एक तरफ इटावा-मैनपुरी से निकलती समाजवादी राजनीतिक विरासत, दूसरी तरफ पश्चिमी उत्तर प्रदेश से उठती चौधरी विरासत।
और अगर यह मुकाबला पूरे प्रदेश तक पहुंचा, तो 2027 का चुनाव उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नया सवाल छोड़ सकता है—अगली सरकार किसकी होगी?” से पहले सवाल होगा—“अगली सत्ता की सबसे प्रभावशाली महिला आवाज कौन होगी?”
साभार वरिष्ठ पत्रकार लेखक भास्कर दुबे के फेसबुक वाल से


