कोई कुछ कहे, कहता रहे। यह उसका अधिकार है। लोकतंत्र में हर व्यक्ति को अपनी बात कहने की स्वतंत्रता है। लेकिन एक बात हमेशा याद रखनी चाहिए कि कहने और कर दिखाने में बहुत बड़ा अंतर होता है। शब्दों से माहौल बनाया जा सकता है, लेकिन इतिहास केवल कर्मों को याद रखता है। कुछ लोग दिन-रात आरोप लगाते हैं, कुछ लोग बहस करते हैं, कुछ लोग मुद्दे तलाशते रहते हैं, जबकि कुछ लोग चुपचाप काम करके समाज और क्षेत्र के विकास की नई इबारत लिखते हैं।
बहुत पहले की बात है। इतना पहले कि आज सोशल मीडिया पर बैठकर बड़ी-बड़ी बातें करने वाले और हर काम में कमी निकालने वाले तमाम लोग शायद इस दुनिया में भी नहीं आए थे। उस समय परिस्थितियां अलग थीं, चुनौतियां अलग थीं और संसाधन भी आज की तुलना में बेहद सीमित थे। तब विकास के लिए केवल घोषणाएं नहीं, बल्कि मजबूत इच्छाशक्ति और दूरदर्शी नेतृत्व की आवश्यकता होती थी।
करमैनी घाट की चर्चा इसलिए आवश्यक हो जाती है क्योंकि यह केवल एक स्थान का नाम नहीं है, बल्कि इस क्षेत्र के संघर्ष, विकास और परिवर्तन की कहानी का महत्वपूर्ण अध्याय है। आज जो लोग आसानी से पुल पार कर अपने गंतव्य तक पहुंच जाते हैं, शायद उन्हें यह अंदाजा भी नहीं होगा कि एक समय ऐसा था जब करमैनी घाट पार करना किसी चुनौती से कम नहीं था। बरसात के दिनों में लोगों की परेशानियां कई गुना बढ़ जाती थीं। आवागमन बाधित हो जाता था, व्यापार प्रभावित होता था, छात्रों की पढ़ाई प्रभावित होती थी और मरीजों को अस्पताल पहुंचाने तक में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था।
बाद में पीपों के सहारे लकड़ी का पुल बनाया गया। उस समय लोगों को यह एक बड़ी सुविधा प्रतीत हुई, लेकिन उसकी अपनी सीमाएं थीं। हर वर्ष 15 जून के आसपास उसे हटा दिया जाता था। इसके बाद लोगों को नाव और स्टीमर के भरोसे यात्रा करनी पड़ती थी। बरसात और बाढ़ के मौसम में यह यात्रा जोखिम भरी भी होती थी। अक्टूबर-नवंबर तक लोगों को इंतजार करना पड़ता था कि कब स्थिति सामान्य हो और आवागमन सुगम बने। क्षेत्र के लोगों ने वर्षों तक यह कठिनाई झेली है।
उस समय यह इलाका पनियरा विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आता था। क्षेत्र का प्रतिनिधित्व वर्तमान विधायक जी के पूज्य पिता जी कर रहे थे, जो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी भी संभाल चुके थे। उन्होंने इस क्षेत्र की समस्या को केवल एक स्थानीय समस्या नहीं माना, बल्कि इसे जनजीवन और विकास से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय समझा। उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति, प्रशासनिक क्षमता और विकास के प्रति प्रतिबद्धता का ही परिणाम था कि करमैनी घाट को एक सुरक्षित, मजबूत और स्थायी पुल प्राप्त हुआ।
उस पुल का निर्माण केवल ईंट, पत्थर और सीमेंट का काम नहीं था। वह क्षेत्र की जनता के सपनों को जोड़ने वाला पुल था। उसने गांवों को शहरों से जोड़ा, किसानों को बाजारों से जोड़ा, छात्रों को शिक्षा संस्थानों से जोड़ा और आम नागरिकों को बेहतर अवसरों से जोड़ा। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि उस पुल ने पूरे क्षेत्र के सामाजिक और आर्थिक जीवन में एक नई ऊर्जा का संचार किया।
क्षेत्र की गरिमा और सम्मान का ख्याल रखना उनकी कार्यशैली का हिस्सा था। कैम्पियरगंज की पहचान और प्रतिष्ठा को उन्होंने हमेशा प्राथमिकता दी। यही कारण है कि आज भी उनके कार्यों का उल्लेख सम्मान के साथ किया जाता है। उन्होंने राजनीति को जनसेवा का माध्यम माना और विकास को अपनी प्राथमिकता बनाया।
आज उसी विरासत को आगे बढ़ाने का दायित्व उनके पुत्र एवं वर्तमान विधायक श्री फतेह बहादुर सिंह निभा रहे हैं। किसी व्यक्ति की क्षमता का आकलन केवल राजनीतिक विरोध या व्यक्तिगत पसंद-नापसंद के आधार पर नहीं किया जा सकता। उनके कार्य स्वयं उनकी पहचान हैं। क्षेत्र में सड़क, पुल, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य, सिंचाई, खेल और जनसुविधाओं से जुड़े अनेक कार्य हुए हैं, जिनका लाभ हजारों लोग प्रतिदिन उठा रहे हैं।
वास्तव में यदि उनके द्वारा कराए गए विकास कार्यों की सूची बनाई जाए तो वह काफी लंबी होगी। कई ऐसे कार्य हैं जो वर्षों से लंबित थे और जिन्हें पूरा कराने का श्रेय उन्हें जाता है। कई योजनाएं ऐसी हैं जिन्होंने क्षेत्र के विकास को नई गति दी है। यही कारण है कि जनता के बीच उनकी स्वीकार्यता और लोकप्रियता बनी हुई है।
जहां तक करमैनी पुल पर सुरक्षा जाली लगाने की बात है, तो यह सही है कि यह कोई असंभव या अत्यंत कठिन कार्य नहीं था। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि वर्षों तक इसकी आवश्यकता महसूस किए जाने के बावजूद यह कार्य नहीं हो पाया था। कुछ प्रशासनिक और तकनीकी कारणों से इसमें विलंब अवश्य हुआ, किंतु अंततः इसे पूरा कराने का कार्य भी फतेह बहादुर सिंह ने ही किया। आज पुल पर लगी सुरक्षा जाली यात्रियों को अतिरिक्त सुरक्षा प्रदान कर रही है और लोगों को यह विश्वास दिला रही है कि जनहित से जुड़े छोटे-बड़े सभी कार्य महत्वपूर्ण होते हैं।
आज जब कुछ लोग केवल आलोचना के लिए आलोचना कर रहे हैं, तब यह आवश्यक है कि हम इतिहास को भी याद रखें और वर्तमान को भी देखें। विकास की यात्रा केवल नारों और भाषणों से पूरी नहीं होती। इसके लिए संकल्प, मेहनत, धैर्य और जनहित के प्रति समर्पण चाहिए होता है। करमैनी घाट से लेकर आज के सुरक्षित पुल तक का सफर इसी सत्य का प्रमाण है।
आलोचनाएं लोकतंत्र का हिस्सा हैं और होनी भी चाहिएं, लेकिन आलोचना तथ्यों पर आधारित होनी चाहिए, पूर्वाग्रहों पर नहीं। जो लोग क्षेत्र के विकास में योगदान देते हैं, उनके कार्यों का निष्पक्ष मूल्यांकन होना चाहिए। करमैनी की कहानी हमें यही सिखाती है कि समय बीत जाता है, सरकारें बदल जाती हैं, राजनीतिक परिस्थितियां बदल जाती हैं, लेकिन जनहित में किए गए कार्य हमेशा याद रखे जाते हैं।
इसलिए जब भी करमैनी की चर्चा होगी, तब केवल एक पुल की नहीं, बल्कि उस सोच, उस संकल्प और उस विकास दृष्टि की भी चर्चा होगी जिसने क्षेत्र की तस्वीर बदलने का काम किया। इतिहास गवाह है कि जो लोग काम करते हैं, उनके कार्य बोलते हैं; और जो केवल बातें करते हैं, वे समय के साथ स्वयं इतिहास के हाशिए पर चले जाते हैं। करमैनी इसका जीवंत उदाहरण है।
