मुख्यमंत्री जी ने कुछ नहीं बोला /वर्सेस मुख्यमंत्री जी को बहुत कुछ बोला::::::

विशाल प्रताप सिंह की विशेष
जी हाँ ये दोनों उदाहरण मैं लखनऊ में सो कॉल्ड मीडिया कर्मी दिव्या श्रीवास्तव और जेएनयू की धरती से साक्षात सभी को लोकतंत्र की पाठ पढ़ाने निकली नेहा बोरा के बारे में बात कर रहा हूँ । एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में जब राज्य के मुख्यमंत्री अपने पूरे टीम के साथ निकल रहे होते है उस समय एक मीडिया कर्मी को अपने जिम्मेदार मीडिया होने का एहसास होता है और उनके मन में प्रश्न रूपी जिन्न उत्पन्न होता है जिसको उनके बोले बगैर मुख्यमंत्री जी को समझ कर उसका जवाब दे देना चाहिए था और वो इतना जिम्मेदारी भरा प्रश्न था की उसका जवाब न दे पाने के कारण पूरे प्रदेश की शासन व्यस्था गड़बड़ हो गई और पूरे राज्य में वो प्रश्न रूपी जिन्न अभी भी उत्तर की खोज में भटक रहा है ।वो प्रश्न रूपी वीडियो जब देखा तो यही एहसास हुआ की जब प्रोफेसर अपनी पूरी क्लास लेकर गेट के बाहर निकल रहा होता है तो हर क्लास में एक दो बच्चे होते है जिनको उसी समय प्रश्न पूछना होता है और प्रोफेसर फिर उस छात्र के मनोभावों को अछे तरीके से समझते हुए उसे अपनी नेक्स्ट क्लास में उपस्थित होने और बाद में उसको बताने के लिए कहकर चला जाता है लेकिन यहाँ तो प्रश्न इतना गंभीर था कि पूरा उत्तर प्रदेश छोड़िये पूरा ब्रह्मांड हिले जा रहा था तो मुख्यमंत्री जी को जवाब देना तो बनता ही था और उन्होंने जवाब न देकर मानव जीवन ,मीडिया ,महिला ,सभी को ही गहरे संकट में डाल दिया और फिर क्या था एक मुद्दा मिल गया कि मुख्यमंत्री जी ने महिला ,मीडिया सबका अपमान कर दिया ।कभी कभी सोच के ही दुर्भाग्य पूर्ण लगता है की जो इंसान महिला सुरक्षा महिला सम्मान के लिए गुंडों और महिलाओं के साथ छेड़छाड़ करने पर उसको यमलोक भेजने का कार्य कर अपने निजी जीवन को भी खतरे में डालता है (ये कहने के पीछे बस इतना मंतव्य है कि महाराज जी सदैव जीवनपर्यंत मुख्यमंत्री तो रहेंगे नहीं ) उस व्यक्ति के बारे में महिला को आगे करके ऐसी बाते करना बहुत ही तुच्छ मानसिकता लगती है । दूसरा घटनाक्रम कल नेहा बोरा जी गोरखपुर में लोकतंत्र को जीवित करने के प्रयासों में मुख्यमंत्री जी को लंपट गुंडा मवाली दंगाई जैसे गैरलोकतांत्रिक भाषा का प्रयोग करके भाषण देकर लोकतंत्र की आत्मा में प्राण देकर चली आई । नेहा बोरा जी लंपट दंगाई गुंडा आपने अभी देखा ही कहाँ होगा अब तो इतना अमन चैन है की आप गोरखपुर में मुख्यमंत्री के ही शहर में उनको इतने आलंकारिक भाषा का प्रयोग करते हुए उन्हें सम्मानों से जो नवाजा है वो शायद अगर किसी और मुख्यमंत्री का शहर रहा होता तो आपको उत्तर प्रदेश की गुंडई का साक्षात प्रमाण वही मिल जाता।आप तो जेएनयू से आती है जो अपने छात्र संघ चुनावो तक में एक मर्यादित भाषा और एक लोकतांत्रिक माहौल के लिए जाना जाता है और आप के द्वारा इतनी अमर्यादित भाषा वो भी एक मुख्यमंत्री के लिए उसी के शहर में वो जेएनयू के लिए भी अमर्यादित और प्रश्वाचक चिन्ह खड़ा करने वाला है । खैर मैं दोनों दृष्टांत इसलिए प्रस्तुत किया की एक में मुख्यमंत्री जी ने कुछ बोला नहीं और एक में मुख्यमंत्री जी के लिए इतनी गैरलोकतांत्रिक भाषा बोली गई और दोनों जगह सो कॉल्ड विक्टिम कार्ड भी मुख्यमंत्री जी को ही जिमेदार ठहराया गया ।
मुख्यमंत्री जी की संवेदनशीलता सदैव महिलाओं के साथ रही और उनकी सुरक्षा उन्होंने अपनी प्राथमिकता की प्रथम पाठशाला में रखा है ।
