कैम्पियरगंज सिर्फ एक सीट नहीं, बल्कि विरासत, विकास और सर्वसमाज के विश्वास का मॉडल है, जहाँ जातीय गणित नहीं, व्यक्तिगत छवि और काम जीतता है।

 

*कैम्पियरगंज विधानसभा विश्लेषण: क्षत्रिय बाहुल्य नहीं, फिर भी सर्वसमाज के नेता हैं फतेह बहादुर सिंह*

*गोरखपुर।* उत्तर प्रदेश की 320 – कैम्पियरगंज विधानसभा का अपना अलग सियासी इतिहास है। यह सीट 1967 से एक ही परिवार के इर्द-गिर्द घूमती रही है। पहले पिता स्व. वीर बहादुर सिंह और अब पुत्र फतेह बहादुर सिंह।

*1. वीर बहादुर सिंह का दौर – 1967 से विरासत की शुरुआत*
स्व. वीर बहादुर सिंह ने 1967 से यहाँ से चुनाव लड़ना शुरू किया। 1977 में जब पूरे देश में इंदिरा गांधी के खिलाफ लहर थी, सिर्फ एक बार हारे, बाकी कभी नहीं। 1967 से ही लगातार मंत्री पद उनके पास रहा। वे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री भी रहे, भारत सरकार में केंद्रीय संचार मंत्री भी रहे और पीडब्ल्यूडी, सिंचाई, परिवहन जैसे बड़े विभाग संभाले।

क्षेत्र में आज भी बुजुर्ग बताते हैं कि वीर बहादुर सिंह की छवि ऐसी थी कि वे रास्ते चलते लोगों को नौकरी दे देते थे। इसी वजह से आज भी गोरखपुर में उन्हें लोग याद करते हैं।

*2. फतेह बहादुर सिंह का दौर – 1989 से अब तक अजेय*
1989 से फतेह बहादुर सिंह ने चुनाव लड़ना शुरू किया और अब तक 7 बार विधायक बन चुके हैं।

*इस सीट की सबसे बड़ी खासियत -* यह निषाद बाहुल्य सीट है। क्षत्रिय समाज, जिस जाति से फतेह बहादुर सिंह आते हैं, यहाँ संख्या में बहुत कम है। इसके बावजूद वे हर बार जीते।

उनके सामने कौन नहीं लड़ा?
– निषाद समाज के बड़े चेहरे समाजवादी पार्टी से लड़े, हार गए।
– यादव समाज के चेहरे भाजपा और सपा दोनों से लड़े, हार गए।
– कई बाहुबली और धनबली 3-3 बार चुनाव लड़े, वो भी हार गए।

इसका कारण – क्षेत्र का analysis बताता है कि फतेह बहादुर सिंह की पकड़ हर समाज, हर बिरादरी में है। वे जाति नहीं, काम की राजनीति करते हैं।

*3. 2012 का सबसे बड़ा प्रमाण*
2012 का चुनाव इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। जब पूरे प्रदेश में उनकी पार्टी का कोई जनाधार नहीं था, वे शरद पवार की पार्टी NCP के घड़ी निशान पर लड़े, जो यूपी के लिए निर्दल जैसा ही था, फिर भी चुनाव जीत गए। बाद में वे भाजपा में शामिल हुए और फिर जीते।

*4. मुस्लिम वोटरों में भी पकड़*
आमतौर पर भाजपा विधायक को मुस्लिम वोट नहीं मिलता, लेकिन कैम्पियरगंज में उल्टा है। पचमा, रघुवली जैसे मुस्लिम बाहुल्य गांवों के लगभग सभी मुस्लिम वोटर फतेह बहादुर सिंह को ही वोट देते हैं। यह उनके सर्वधर्म, सर्वजाति समीकरण का प्रमाण है।

*5. 2027 की संभावना*
वर्तमान स्थिति में कैम्पियरगंज में फतेह बहादुर सिंह को सभी जातियों और सभी धर्मों का समर्थन प्राप्त है। निषाद पार्टी का उभार, सपा का यादव-मुस्लिम समीकरण और बाहुबलियों की एंट्री के बावजूद, अभी तक का माहौल फतेह बहादुर सिंह के पक्ष में ही दिख रहा है। अगर कोई बड़ा सियासी उलटफेर नहीं हुआ तो वे फिर से सबसे मजबूत दावेदार हैं।

 

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